Yaadon ka storeroom

आज  यादों का storeroom खोला

हिम्मत का पत्थर मार  के

उसका वह ज़ंग लगा टाला तोड़ा

थोड़ा घबराते हुए उस अँधेरे में कदम बढ़ाया

 

डर किसी अंजान का नहीं था

क्यूँकि था तोह वह अपनी ही यादों का घरोंदा

डर था उस एक संदूक से टकराने का

जिसमें कुछ लम्हों को खुद से दूर कर के रखा था

वह लम्हें जो किसी और वक़्त की याद दिलाते थे

जो कुछ मासूम ख्वाहिशों की परछाई थे

जो कुछ बेबाक़ ख्यालों को पर देते थे

 

मैं संभलते हुए आगे बढ़ी

एक राह पड़े सन्दूक से टकराई

थोड़ी धूल हटी, यादोँ ने थोड़ी दस्तक दी

और हिम्मत ने ज़वाब दे दिया

Revisiting memories

Some doors are best not opened

 

Image source: Google Image search

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